इन  लाल  इंटो  में ,

न जाने कितनी  कहानियाँ  दफ़्न हैं ।

सुना तो लूँ मैं मगर

बोलने के लिए न लफ्ज़ है ॥

 

वो  8:45 वाली  ‘classes’,

सुबह जिनकी असीर बन गयी ।

कुछ नींद में, और कुछ,

बस  CP सोचने में गुज़र गयी ॥

 

उसके बाद रामभाई की चाय ,

जिसपे तक़दीरें लिखी जाती थीं  ।

कभी उसकी दुकान की सलाखें,

अपनी कैद की भी याद दिल जाती थीं  ॥

 

जीत की इस दौड़ में

हमें भी कई दफा आया रोना ।

लोग जब आगे निकल गए

तब सहारा था LKP का कोना ॥

 

एक और कोने पे

बातें हुआ करती थीं हज़ार ।

CT का वो Table No. चार

जहाँ सारी हसरतों का हुआ इज़्हार ॥

 

Tapri की वो खटिया,

लोग जहाँ करते थे घुलमिल ।

रात हो या सुबह,

जवान रहती थी महफ़िल ॥

 

उसी महफ़िल से विदा लेके

आज जो हम चल दिए ।

ज़िंदा तो अब भी है,

बस ज़िन्दगी पीछे छोड़ दिए ॥

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